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हिमालय अपने में जहरीली गैसों को समाहित कर नीलकंठ की भूमिका निभा रहा है- रमेश पोखरियाल ’’निशंक’


हिमालय दिवस-2019 के अवसर पर हिमालयन यूनिटी मिशन, उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केन्द्र (यूसर्क), विज्ञान भारती उत्तराखण्ड के द्वारा हिमालय, विज्ञान चिंतन व विवेचन समिट का आयोजन किया गया। जिसमें समिट के मुख्य अतिथि श्री रमेश पोखरियाल ’’निशंक’’ जी, संरक्षक और अध्यक्ष, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत जी, विशेष अतिथि परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और संस्थापक हेस्कोे, पद्मश्री डाॅ अनिल प्रकाश जोशी जी ने सहभाग किया। निदेशक, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, यूएसएसी विभाग के प्रोफेसर दुर्गेश पंत जी ने सभी विशिष्ट अतिथियों का स्वागत और अभिनन्दन किया। सभी विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर सरस्वती वंदना के साथ समिट का शुभारम्भ किया।

रिपोर्ट  - 

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत जी, ने कहा कि पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुये हमने सचिवालय में पालिथिन पर प्रतिबंध लगा दिया है। सचिवालय में पानी की बाॅटल आपको काँच की मिलेगी या तांबे की मिलेगी प्लास्टिक की बाॅटल पूर्ण रूप से प्रतिबंधित है। उन्होने कहा कि आजकल बाजार में जल को स्वच्छ करने वाली जो मशीनें है उनके माध्यम से अत्यधिक मात्रा में जल का अपव्यय होता है। वैज्ञानिक रिसर्च के आधार पर यह साबित हो गया है कि उत्तराखण्ड के जल को प्यूरीफायर की जरूरत नहीं है। माननीय मुख्यमंत्री जी ने वहां उपस्थित बच्चों से कहा कि आप सभी उत्तराखण्ड का भविष्य हो उन्होने बच्चों को पालिथीन का उपयोग न करने, प्लास्टिक का उपयोग कम से कम करने, हिमालय की सुरक्षा के लिये वृक्षारोपण करने तथा जल के स्रोतों के संरक्षण का संकल्प कराया। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री, भारत सरकार, श्री रमेश पोखरियाल ’’निशंक’’ जी ने कहा कि ’’हिमालय पूरी दुनिया का जीवन है उसे हमें जानना होगा और उसके दर्द को महसूस करना होगा। उन्होने पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, डाॅ अनिल जोशी जी, जंगली जी, डाॅ दुर्गेश जी, विधायक जी और पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य कर रहे पर्यावरण प्रेमियों को सम्बोधित करते हुये कहा कि ये सभी हमारी प्रेरणा के स्रोत है और इन सभी का दृढ़ संकल्प से ही हमारे देश को विश्वगुरू का गौरव प्राप्त है। उन्होने कहा कि वन संरक्षण के क्षेत्र में उत्तराखंड के प्रयासों से बेहतर कुछ नहीं है, दुनिया के लिये सबसे बेहतर वन संरक्षण का उदाहरण है हमारा राज्य। पेड़ों की लिये अपनी जान की कुर्बानी देने वाले लोग भी उत्तराखण्ड की धरती पर है। इस अवसर पर उन्होने गौरा देवी को याद किया। माननीय निशंक जी ने डाॅ कलाम जी के व्यक्तित्व को याद करते हुये अपनी स्वलिखित कविताओं का पाठ किया। उन्होने कहा कि हिमालय, भगवान शंकर की धरती है, विश्व के प्रगतिशील देश जो जहरीली गैसे छोड़ रहे है उसे हिमालय अपने में समाहित कर नीलकंठ की भूमिका निभा रहा है। उन्होने योग और वेद की ऋचाओं पर भी चर्चा की तथा कहा कि हमारे पास जो हमारी धरोहर है उसका पेटेंट होना चाहिये।’’ ’’स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि शाप, ताप और संताप से मुक्ति पाने का माध्यम हैे हिमालय। युद्ध के पश्चात अभिशाप से मुक्त होने के लिये पाण्डवों ने भी तपस्या करने के लिये हिमालय को चुना था इसलिये हिमालय शाप से मुक्ति दाता है। हिमालय का चिंतन और संरक्षण केवल पर्यावरण के लिये ही नहीं बल्कि हिमालय तो आन्तरिक यात्रा है। इसे हिमालय दिवस के साथ कृतज्ञता दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिये। स्वामी जी ने कहा कि नदियों के तटों पर हमने आरती का क्रम आरम्भ किया यह केवल भारतवर्ष में ही सम्भव है। हिमालय के प्रति कृतज्ञता भारत की संस्कृति है; कृतज्ञता की संस्कृति है। अर्पण, तर्पण और समर्पण की संस्कृति है हिमालयन संस्कृति और यही दृष्टि हिमालय दृष्टि है।’’ स्वामी जी महाराज ने कहा कि हिमालय है तो हम है, हिमालय है तो गंगा है और हिमालय है तो नदियाँ है। हिमालय, हमें केवल जीवन ही नहीं देता बल्कि हिमालय जैसा जीवन जीने का हौसला भी देता है। इसने साहित्यकारों को सृजन, संगीतकारों को सरगम और संतों को शिवत्व प्रदान किया है। हिमालय, पर्वत के रूप में शोभायमान ही नहीं रहा और न ही भारत माता का मुकूट बना बैठा रहा बल्कि यह भारत की ढ़ाल बनकर सदियों से हमारी रक्षा के लिये तैनात है। अगर हिमालय के निवासी हिमालय में रहकर उसके लिये कुछ नहीं कर रहे अर्थात वे अपना जीवन और समय दोनों नष्ट कर रहे है। उन्होने कहा कि हिमालय को लहूलुहान मत करो बल्कि उसे हरियाली से लहलहाने दो। अब तो हिमालय के लिये प्लेज नहीं बल्कि हमें उसकी पल्स बनना होगा।’’ स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने हिमालय के संरक्षण हेतु कई सुझाव दिये यथा हिमालयन राज्यों में अवैज्ञानिक तरीके से बड़े-बड़े बांध न बनाकर छोटे-छोटे बांध बनायें जाये, बारूद बिछाकर सुरंगे खोदने से भी पहाड़ों को अत्यधिक नुकसान पहुंचता है। हमारे द्वारा ऐसा कोई कार्य न किया जाये जिससे पहाड़ों के नैसर्गिक अधिकारों का हनन होता हो। उन्होने कहा कि पहाड़ों के लिये दीर्घकालीन विकास एजंेडा होना चाहिये ऐसा नहीं कि बार बार पहाड़ों का सीना चीर कर सड़कों का निर्माण किया जाये। हमें सतत विकास की प्रक्रिया को अपनाना होगा। साथ ही हिमालय से पलायन रोकना होगा क्योकि जब तक लोग खेती करेंगे और हिमालय में रहेगे तब तक हिमालय भी आबाद रहेगा। हिमालयी राज्यों की सरकारों, (सांसद, विधायक) प्रदेश की सक्षम संस्थायंे और अन्य पर्यावरण प्रेमी एनजीओ को प्रतिवर्ष कम से कम 5 हजार वर्षो का रोपण और संरक्षण की जिम्मेदारी लेनी चाहिये। उन्होने भौतिक गतिविधियों के बजाय संास्कृतिक विकास के महत्व पर जोर दिया। स्वामी जी ने कहा कि ऋषिकेश के पश्चात अन्दर पहाड़ों पर जाने वाले प्रत्येक वाहनों पर पर्यावरण शुल्क लगाया जाना चाहिये, पहाड़ों पर जितने भी मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्धारें, होटल, आश्रम है उन्हे पूर्ण रूप से एकल उपयोग प्लास्टिक और प्लास्टिक बाॅटल के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाये और उपयोग करने पर इसके लिये दंड का प्रावधान रखा जाये। हिमालय को जीवित रखना है तो पहाड़ों पर जितनी भी बंजर पड़ी जमीन है उस पर चरणबद्ध तरीके से वृक्षारोपण और उन पौधों का संरक्षण किया जाना आवश्यक है। स्वामी जी महाराज ने कहा कि मेरी दृष्टि में हिमालय के लिये हिमालय दिवस पर केवल एक दिन चिंतन नहीं होना चाहिये बल्कि हमारा हर कर्म चितंन के बाद ही हो ताकि इससे हिमालय के स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं पहुंचे। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने हिमालय दिवस के अवसर पर सभी अतिथियों को पर्यावरण का प्रतीक रूद्राक्ष का पौधा भेंट किया।

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