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हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में अम्बेडकर सेंटर फॉर एक्सीलेंस


आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर स्वराज की अवधारणा नशे की लत के कारण खतरे में पड़ रही हैं क्योंकि हमारी आबादी का बड़ा हिस्सा इसका गुलाम बन चुका है । इसके साथ ही उन्होंने नशे के लक्षण, दुष्प्रभाव ,कारण , पुनर्वास तथा इसके संदर्भ में केंद्र तथा राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी ।

'आज़ादी के अमृत महोत्सव ' को लेकर तय कार्यक्रमों की श्रृंखला में आज हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में अम्बेडकर सेंटर फॉर एक्सीलेंस ( DACE) के तत्वावधान में राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा "नशा मुक्त भारत अभियान" विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया । कार्यक्रम का आरंभ नशे की कुरीति के विरुद्ध समन्वयक प्रो एम एम सेमवाल ने श्रोताओं को शपथ दिलाकर किया । कार्यशाला का संचालन करते हुए शोध छात्रा शिवानी पांडे ने इसके विषय में जानकारी दी तथा भारत एवं उत्तराखंड में नशे के बढ़ते कुप्रभाव पर चिंता व्यक्त की । इसके बाद शोध छात्रा विदुषी डोभाल ने पीपीटी के माध्यम से अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया । उन्होने कहा कि आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर स्वराज की अवधारणा नशे की लत के कारण खतरे में पड़ रही हैं क्योंकि हमारी आबादी का बड़ा हिस्सा इसका गुलाम बन चुका है । इसके साथ ही उन्होंने नशे के लक्षण, दुष्प्रभाव ,कारण , पुनर्वास तथा इसके संदर्भ में केंद्र तथा राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी । शोध छात्रा मनस्वी सेमवाल ने विस्तृत रूप से इसके विभिन्न पहलुओं पर अपनी बात रखते हुए इस संदर्भ में अरुणाचल प्रदेश का उदाहरण दिया जहां राज्य सरकार ने नशे की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए अनेक प्रभावकारी कदम उठाए हैं । संस्कृत विभाग के शोधार्थी अभिजीत ने धर्म तथा आध्यात्मिक तत्वों के माध्यम से विषय को वर्णित किया । समाजशास्त्र विभाग के शोधार्थी अंकित उछोली ने इसके मनोवैज्ञानिक - सामाजिक- शारीरिक समस्या के रूप में चिन्हित करते हुए कहा कि आज नशे को सामाजिक स्वीकृति मिल गयी है जिसमें बड़ी भूमिका फिल्मों की भी रही है । अंग्रेज़ी विभाग के डॉ नीतीश बोंठियाल ने कहा इस बुराई के समाधान के लिए सामाजिक रूप से अधिक सजग एवं जिम्मेदार होने की आवश्यकता है । साथ ही हमें सबसे पहले खुद इस तरह की बुराइयों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। संस्कृत विभाग की शोध छात्रा दीपांशी ने अपने निजी अनुभवों के आधार पर इस विषय में व्यावहारिक जानकारी दी । हिंदी विभाग के डॉ अमित कुमार ने कहा हमारे पारंपरिक रीति- रिवाजों में इस तरह के दुर्विचारों को कोई स्थान नहीं दिया गया है लेकिन आज यह हमारे आम जीवन का भाग बन गया । उत्तराखंड जहां नशे के विरुद्ध बड़े जनान्दोलन हुए हैं वहां भी इसकी लत बढ़ती जा रही है । राजनीति विज्ञान विभाग के डॉ नरेश कुमार ने कहा कि दुनिया में नशे का कारोबार कई कई देशों की जीडीपी से भी अधिक है जिससे इसकी गंभीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है । इसके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही भी छोटे स्तर पर होती है जबकि इनके बड़े स्रोतों को चिन्हित कर सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है । संस्कृत विभाग के डा आशुतोष गुप्ता ने कहा कि यह एक सामाजिक समस्या है ना कि राजनैतिक समस्या और इसके विरुद्ध सबसे कारगर हथियार शिक्षा तथा जागरूकता ही है । सरकारें अपने राजस्व जुटाने के लिए इनको लगातार बढ़ावा दे रही है इसलिए लोगों को स्वयं से ही प्रयास करने होंगे । इस कार्यक्रम के संयोजक तथा डॉक्टर अंबेडकर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के समन्वयक प्रो एम एम सेमवाल ने कहा कि सामाजिक न्याय तथा आधिकारिता मंत्रालय के तत्वावधान में 15 अगस्त 2020 से नशा मुक्त भारत अभियान चलाया जा रहा है । उन्होंने इस संदर्भ में विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत विश्व का सबसे युवा देश है। ये युवा असीम ऊर्जा के भंडार हैं और युवाओं की इस ऊर्जा को सही दिशा में परिवर्तित करने की जरूरत है जो इस समय नशे की गिरफ्त में आ गए हैं । युवाओं के लिए कॉलेज और विश्वविद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रम चलाकर उन्हें इससे बचाया जा सकता है । सबको एक जिम्मेदार नागरिक की तरह चुप रहने के बजाय इसके ख़िलाफ खड़े होने की जरूरत है तभी इसका सफल समाधान किया जा सकता है । ऐसी ही पहल उत्तराखंड के कई गांव में शुरू की गई है जहां महिलाओं द्वारा शादी-विवाह जैसे कार्यक्रमों में शराब परोसने पर सख्त पाबंदी लगाई गई है । अतः इस तरह के सामूहिक प्रयासों से ही "नशे" जैसी कुरीति के विरुद्ध जंग जीती जा सकती है । इस अवसर पर राजनीति विज्ञान ,संस्कृत ,समाजशास्त्र ,हिंदी तथा अंग्रेजी विभाग के शोधार्थी तथा स्नातकोत्तर कक्षाओं के विद्यार्थी उपस्थित रहे ।

अंजना भट्ट घिल्डियाल

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